रविवार, 24 फ़रवरी 2013

ऐसे किस्से मरते नहीं


एक कहानी आप सब के नाम...


दादा जी बताया करते थे कि वो इतना शातिर था कि कभी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा और पुलिस इतनी नाकारा थी कि कभी उसको पकड़ने का कोई कारगर तरीका ईजाद नहीं कर पाई। उन दिनों गोरखपुर के करीब कप्तानगंज में उनकी पोस्टिंग थी और आजादी के फौरन बाद पुलिस महकमे की जो हालत थी उसमें नौकरी करने भी ज्यादा मुश्किल था खुद की हिफाजत करना। गांव से तीन कोस थाना था यानि गांव में कोई वारदात हो जाए तो तीन कोस तक खबर पहुचने में तीन पहर लग जाते थे और डकैत तो होते ही थे सयाने । वारदात भी मौका देख कर करते.. उन्हें हमेशा पता होता था कि थानेदार किस वक्त ताड़ी पीता है या फिर इस वक्त वो कौन से गांव में बैठा खाने पीने में मगन है। जगना डाकू की कहानी भी फिल्मी कम नौटंकी जैसी ज्यादा लगती थी। मैं और मेरा छोटा भाई अक्सर शाम को बैठकर जगना डाकू के किस्से सुना करते थे। मेरे दादाजी भी थोड़ा अलग किस्म के इंसान थे... पहले तो उस डकैत का किस्सा सुनाते वक्त उसे पांच पांच सौ बार गरियाते थे फिर फक्र से ये भी बताते थे कि वो उन्हें कितना मानता था और हर नवरात्र जब वो काली के मंदिर में पूजा करने आता था तो उन्हें सूचन भिजवा देता था कि मुंशीजी.. बाल बच्चेदार आदमी हो ..इसलिए हमार बात मान लेव,..पूजा में छुट्टी लेकर घर चले जइहो नाही तो कुछ ऊंच नीच होई गवा तो फिर हमका माफ करई कि खातिर भी ना रहिहो....निहाल जिंदादिल आदमी था....ऐसा कहना था दादाजी का...और हम ऐसे किस्से सुनते थे मानों राबिनहुड की स्टोरी हो.. दरअसल जगना डाकू डाकू था ही नहीं.. दादाजी का कहना था कि पहले वो अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ लड़नेवाले एक रियासतदार का मातहत था लेकिन जब उस रियासतदार को अंग्रेजी फौजों ने मार डाला तो वो राप्तीपार नेपाल के जंगलों में भाग गया। एक लंबे वक्त तक तो उसकी कोई खोज खबर नहीं हुई लेकिन एक दफे किसी पुराने परिचित ने जगन डाकू को देखा तो उसकी पहचान खोल दी। दादाजी कहते थे राप्ती पार जितने गांव थे वहां के लोग जगना के नाम से डरते नहीं थे उसकी पूजा करते थे। जगना की कहानी में फुलवरिया भी है। वो एक बेवा थी यानी विधवा.. जिसका काम था काली मंदिर में साफ सफाई करना वहां का बाबा एक अघोरी था और उसी ने फुलवरिया को आसरा दे रखा था हालांकि एकाध दफे कुछ गांववालों ने फुलवरिया को मंदिर से निकालने के लिए जुगत भिड़ानी शुरु की। लेकिन जब उनमें से एक-एक कर तीन गायब हो गए.. तो लोगों को पता चला कि फुलवरिया पर जुगना की छतरछाया है....ये सब कहानी के वो हिस्से थे जो कभी सुनाए नहीं जाते थे लेकिन जैसे पूजा में बीच-बीच में अक्षत छिरका जाता है वैसे ही छिरक जाते थे। जगना ना तो कभी किसी गांववाले को मारता था और ना ही कभी किसी का घऱ उजाड़ता था जब भी उसे पता चलता कि फलां सेठ कमा कमा कर इतना मोटा हो गया है कि उसकी लंबाई चौड़ाई का अनुपात निरंतर कम हो रहा है तो वो उसके घर बिन बुलाए मेहमान की तरह आ धमकता उसकी तिजोरी खुलवाता और फिर मतलब भर का माल लेकर चंपत हो जाता...उसने जितनी घरो में वारदातें की उनमें किसी को भी कंगाल नहीं किया। मुझे समझ नहीं आता कि दादाजी किसी डाकू का किस्सा सुना रहे हैं या फिर साधू का.....लेकिन था बहुतै कमीना..एक दफे कप्तान साहेब के आने पर किसी ने उनसे जगना की शिकायत कर दी। कह दिया साहेब बहुत बड़ा डकैत है जबतक मारा ना जाएगा। इलाके में अमन चैन नहीं आवेगा। जगना को किसी तरह खबर लग गई। ससुरे का कनेक्शन इतना तगड़ा था कि ये भी पता कर लिया कि किस साले ने कप्तान साहेब से लगाई है। फिर का था अगले सोमवार उसके घऱ जा धमका और फिर उसे घने जंगल में ले जाकर ऐसी जगह छोड़ आया कि वो वहीं भटककर मर गया। ..दादाजी जगना का किस्सा सुनाते वक्त बहुत सतर्क रहते थे किसी तरह से भी ऐसी कोई बात उनके मुंह से ना निकले जिससे बच्चे डर जाए...बच्चों को कहानी सुनाना सचमुच टेढ़ी खीर होता है... सच बता नहीं सकते औऱ झूठ के सहारे कोई किस्सा कभी सच जैसा बताया नहीं जा सकता...कहानी सुनते वक्त हम भी गुणा-भाग करते रहते..अच्छा तो ये था...अच्छा तो वो था... लेकिन हम भी कहीं ना कहीं समझते थे कि जो भी हो जगना डाकू कमीना तो बहुत रहा होगा....क्योंकि कहानी में जब भी कोई टर्निंग प्वाइंट आवे और हमें लगे कि कुछ खास अब होने वाला है दादा जी कहानी बीच में रोक देते.. ऐ तुम लोगों को पढ़ना-लिखना नहीं है क्या इसी किस्सा कहानी से इम्तिहान पास करोगे। और हम उनकी बात अनसुनी कर अड़ जाते कि आगे का बताओ फिर जाएंगे। मजबूरन उनको फिर से शुरू करना पड़ता। ये किस्सा बहुत लंबा है पूरी रात नहीं खत्म होगा आगे का कल सुनना । लेकिन हम भी कहां मानने वाले थे....अभी वाली बात को खत्म कर दो फिर कल आगे का सुन लेंगे। ..दादाजी एक लोटा पानी मंगवाते खंखारकर पानी पीते औऱ फिर शुरु हो जाते....जगना ने ब्याह रचा डाला फुलवरिया से ...सब नाचे... ठाकुर भी नाचे औऱ धोबी भी.....अघोरी ने भी ताड़ी लगाई और पूरी रात बिरहा गाया। और आप पुलिस वालों को क्या खबर नहीं होती थी इन सब चीजों की... होती थी हमको होती थी हमारे साहेब को भी होती थी और उनके साहबे को भी होती थी लेकिन हम ठहरे हुकुम बजाने वाले और वो ठहरे हुकुम की तालीम करवाने वाले....उनके ऊपर और भी थे जो हुकुम देते थे वो कौन से हम कभी मिले नहीं उनसे ना ही वो हमारे काम का कभी मुआयना ही करने आए...जैसे ही वो ये सब बताना शुरु करते हमें यही लगता कि वो अब हमे किसी तरह से टरकाना चाहते हैं और इसी खातिर हमें बोर करने की जुगत भिड़ा रहे हैं....बाबा जगना ने शादी कर ली फिर क्या हुआ....आगे भी तो बताइए वो पकड़ा गया.. मारा गया..या फिर भाग गया।......उसका हुआ क्या......

जगना कोई ऐसा वैसा डाकू नहीं था कि उसे इतनी आसानी से पकड़ा जा सके...वो असल मायने में डकैत था....कहते हैं फुलवरिया से ब्याह रचाने के बाद उसने डकैती से तौबा कर ली अपने परिवार के साथ वो राप्तीपार जंगलों मे जाकर बस गया ....सुनते हैं उसके ग्यारह बेटे हुए... उन लड़कों को उसने दूर किसी शहर भेज दिया.....जहां वो पढ़लिख गए और बाद में काम धंधे में लग गए.. औऱ जगना डाकू... वो साधू हो गया औऱ सुनते हैं कि उसने अघोरी का रूप धर लिया औऱ जंगल में ही एक मंदिर बनवाया और वहीं फुलवरिया के साथ रहने लगा.....लेकिन बाबा... किसी डकैत के किस्से की इतनी आसान मौत कैसे हो सकती है....ये सवाल तब दिमाग में कौंधता भर था उसे सवाल का जामा पहनाने की काबिलियत हमारे पास नहीं थी....अब हमारे पास सवाल है मगर दादाजी नहीं है.. जगना तो साधू होकर मुक्त हो गया लेकिन किस्से का अंत नहीं हुआ..दादाजी समझदार थे उन्होंने हमें किस्सा नहीं सुनाया...बल्कि एक याद बनकर हमारे जेहन में पैबस्त हो गए....जिंदगी की भागमभाग में हम कितना भी मशरूफ क्यों ना रहे...जगना का किस्सा हमारे जेहन में पैबस्त रहेगा.. और पैबस्त रहेंगे उससे जुड़े सवाल और इसी बहाने हमारे दादाजी भी.. कभी-कभी लगता है कितने समझदार थे हमारे पूर्वज...
दीपक नरेश

शनिवार, 20 अगस्त 2011

बप्पी दा..कहां हो?

पहली बार ऐसा हो रहा है.. किसी करिश्मे से ये कम नहीं.. समझ नहीं आ रहा कि हैरान होऊं या परेशान.. पूरा हिंदुस्तान अन्ना की हुंकार सुनकर आंदोलन में शामिल हो चुका है. .लेकिन अबतक अपने दादा कहीं नजर नहीं आए हैं.. ना रामलीला मैदान में और ना ही टीवी पर.. अरे भई.. मैं बात कर रहा हूं अपने बप्पी दा की.. हिंदुस्तान की तवारीख में ऐसा कौन सा जलसा.. आंदोलन या नुमाइश हुई होगी जिसमें दादा मय सेल्फ मेड गाना शिरकत ना किए हों.. कुछ नहीं होता था तो बप्पी दा.. अपनी स्वर्णाभूषित स्थूलकाय काया दिखाकर ही उत्साहित कर जाते थे..कि बच्चा जो चमका नहीं तो वो सोना ही क्या.. लेकिन आज उनके चाहने वाले वाकई उदास हैं.. दादा कहां हैं..दादा अबतक नजर क्यों नहीं आए.. पूरा हिंदुस्तान लोकपाल..लोकपाल की ललकार के साथ सड़क पर उतर आया है लेकिन बप्पी दा का कोई पता नहीं.. ताज्जुब ये हो रहा है कि आंदोलन जैसे..जैसे आगे बढ़ता जा रहा है.. बप्पी दा की कमी उतनी ही ज्यादा अखरने लगी है.. आखिर क्यों नहीं वो आगे आकर कोई ऐसा गाना गढ़ रहे.. जिसे सुनकर लोगों को लगता कि बस इसी की तो कमी थी.. आंदोलन में ....ये मिल गया.. समझो आंदोलन चमक गया ... इसलिए एक सजग संगीतप्रिय श्रोता होने के नाते मेरी बप्पी दा से गुजारिश है कि जहां कहीं हो...एक बार झलक दिखला दें और अपने चाहने वालों को एक बार फिर अन्ना के आंदोलन पर एक तड़कता..फड़कता गीत सुना दें..

आपका हमसफर

दीपक नरेश




गुरुवार, 18 अगस्त 2011

अब कामयाबी दूर नहीं..

अन्ना ने देश में एक ऐसी लहर पैदा कर दी है जिसने हर आदमी में ये भरोसा जग गया है कि हां भ्रष्टाचार को मिटाया जा सकता है.. हर हिंदुस्तानी वो चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो.. अन्ना की मुहिम में जुड़ने को बेचैन है। अफसोस.. सरकार इस बेचैनी को क्यों नहीं वक्त रहते महसूस कर पा रही है.. सच्चाई ये है कि सरकार को अपनी हार साफ दिख रही है.. अन्ना से भी और सियासी मोर्चे पर भी.. हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी पता नहीं क्यों जनता की नब्ज महसूस नहीं कर पा रहे.. क्या ये कांग्रेस के पतन के संकेत हैं.. आज से सात दशक पहले जब आजादी की ल़ड़ाई अपने अंजाम तक पहुंच रही थी.. महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी के बाद कांग्रेस को खत्म कर दिया जाना चाहिए.. कहीं अन्ना के अनशन से पैदा हुई अगस्त क्रांति कांग्रेस के पतन की इबारत तो नहीं लिखने जा रही..
मैं ये नहीं समझ पा रहा है कि इस आंदोलन में ऐसा क्या है जो कांग्रेस और उसके आलाकमान को नजर नहीं आ रहा..शायद आजादी के बाद ये पहला मौका है जब किसी मुद्दे को लेकर हिंदुस्तान की जनता इस कदर एकजुट नजर आ रही है और वो भी बेहद अनुशासित तरीके से.. लोग अन्ना के सत्याग्रह को अच्छी तरह समझ रहे हैं उनमें आक्रोश नहीं है.. उनमें सत्ता को उखाड़ फेंकने की बेचैनी नहीं हैं.. उनमें सियासतदानों को सबक सिखाने की भी कोई चाहत नहीं है.. वो आज को बदलने को उतने बेचैन नहीं है जितना इस बात को लेकर कि आने वाला कल बेहतर हो.. और इसके लिए वो किसी किस्म की हिंसा का भी सहारा नहीं लेना चाहते.. खुद अन्ना और उनकी टीम इस बात को साफ कर चुकी है कि वो आंदोलन को बेहद शांतिपूर्ण तरीके से चलाने के हिमायती हैं। लेकिन अफसोस की बात ये है कि सरकार कभी अफवाहों का सहारा लेकर तो कभी उलटे सीधे बयान देकर जनता को भरमाने की कोशिश कर रही है.. क्या ये ठीक है? लोग जानना चाहते हैं कि आखिर सरकार को ऐसी क्या परेशानी है जिसके चलते वो इस आंदोलन की हवा निकालने को तुली है.. क्या सरकार में बैठे नुमाइंदे डर गए हैं कि कहीं उनके चेहरे से नकाब ना उतर जाए.. कहीं लूट-खसोट की उनकी आजादी को ग्रहण ना लग जाए.. कहीं उनकी निरंकुश और भ्रष्ट सत्ता पर ईमानदारी का पहरा ना बैठा दिया जाए।

असल में यही होने जा रहा है आज नहीं तो कल.. क्या सरकार के नुमाइंदों को वो आवाज सुनाई नहीं दे रही जो कभी किसी गीतकार की .. कभी किसान की.. कभी वकील की.. कभी छात्र की.. कभी कामगार की.. कभी इंजीनियर की... कभी फिल्मकार की.. कभी कलाकार के जज्बातों का इजहार कर रही है.. सब बदलाव चाहते हैं और इस बदलाव को होने से रोका भी नहीं जा सकता है तो फिर आखिर मनमोहन सरकार किस चीज की इंतजारी कर रही है.. क्या वो चाहती है कि उसके चेहरे पर विलेन का लेबल चिपका कर ही उसे गद्दी से उतारा जाए.. जनता एकजुट है भ्रष्टाचार के खिलाफ.. बेईमान सरकार लामबंद हैं अन्ना के खिलाफ.. लेकिन जनता और सरकार के बीच ये जो अन्ना नाम का जीव अपनी बूढ़ी काया के साथ इतिहास को करवट लेने के लिए मजबूर कर रहा है उसकी ताकत का अंदाजा शायद सरकार नहीं लगा पा रही है.. आने वाले चंद दिन हिंदुस्तान की अवाम के लिए बेहद खास रहने वाले हैं.. चंद दिनों बाद उन्हें आजादी के बाद उगने वाला सूरज फिर से एक बार दिखाई देने वाला है.. उससे निकलने वाली उम्मीदों की किरनें हिंदुस्तान में ऐसा उजाला फैलाएंगीं कि सारी दुनिया उसकी चमक देखेगी.. वो देखेगी एक ऐसा आंदोलन के अंजाम को जिसको एक बेहद बूढ़े इंसान ने नौजवान पीढ़ी की ताकत से हकीकत में बदल दिया... वक्त आ गया है आइए हम एकजुट हों और जहां कहीं भी हैं वहीं से अन्ना की आवाज में आवाज मिलाकर कहे.. कि भ्रष्टाचार भारत छोड़ो...
जय हिंद, जय भारत
आपका हमसफर
दीपक नरेश

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

सुख







एक चुटकी
आसमान,
दो चुटकी
बादल..
चारपाई
का कोना,
एक मुट्ठी
गुड़धनिया..
रत्ती भर
हंसी ठिठोली..
थोड़ी सी
बात बोली...
सुख को पसरने को
और क्या चाहिए.......


गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

ईश्वर के नाम एक कविता



दोस्तों, लंबे समय बाद वापसी हुई है, आशा है आप सब सानंद होंगे। एक कविता आप सब के लिए..

मौन है अभिव्यक्ति मेरी,
मौन मेरी आस है,
मौन है सब चोट मेरी,
मौन मेरा विश्वास है,

नहीं है ये व्यथा मन की,
गर नहीं आवेश है..
भाव सकल शांत हैं..
उद्दिग्न किंतु परिवेश है..

क्यों कहूं कैसे कहूं..
जो शब्द मुखर-मौन है,
कौन फिर भी सुन रहा इन्हें,
वह कौन है.. वह कौन है?

जो है चराचर जगत की,
छाया का छिटका एक कण,
मेरे ह्रदय की ओस बन,
मेघों का संगी कौन है?

बरसे कहीं जो भूल से,
तो तृप्ति का तारण करे,
बन कर पराग पुष्प का,
भ्रमरों का जीवन कौन है?

हर मौन में भी मौन है,
वो आदि सा अनादि सा,
हर आत्म में परमात्म सादृश,
वो सखी- संगी कौन है?

मौन को भी शब्द दे,
जो खुद को करे अभिव्यक्त है,
वो अव्यक्त से व्यक्त फिर,
अव्यक्त होता कौन है?


आपका हमसफर,
दीपक नरेश

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

ये कैसा लोकतंत्र ?


हर दिन एक हादसा होता है हर दिन एक उम्मीद दम तोड़ देती है.. कुछ इस तरह राजनेताओं की तसल्ली हमारे हौसले को सुकून देती है...आप इसे भले ही मेरी तुकबंदी का नाम दे.. लेकिन जिस दिन से देश के अनुभवी और बेहद काबिल गृह मंत्री शिवराज पाटील का दिल्ली धमाकों के बाद का बयान कानों में गया यकीन मानिए..तबसे कम्बख्त कान में ही घुसा हुआ है निकलने का नाम ही नहीं ले रहा..बड़ी कोशिश की कि धमाके के बाद फिर धमाके..फिर भगदड़ और फिर ..बेकसूरों की मौत को उनकी बदकिस्मती मान कर दिल को तसल्ली दे दी जाए कि इतनी बड़ी आबादी वाले लोकतंत्र में ये सब तो होता ही रहता है लेकिन आज जब जवानों की मौत की खबर अखबार में पढ़ी तो तय किया कि कोई सुने या ना सुने कहूंगा जरूर..
तो आज केवल दो खबरों का जिक्र करना चाहूंगा...पहली छत्तीसगढ़ में मंत्री महोदय की हेलिकॉप्टर सवारी सीआरपीएफ के दो जवानों की जिंदगी पर भारी पड़ गई और वो दोनों जवान बेमौत शहीद हो गए..शहीद लफ्ज का इस्तेमाल इस लिए कर रहा हूं क्योंकि ये जवान राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के बस्तर दौरे में हुए नक्सली ब्लास्ट में जख्मी हुए थे और डॉक्टरों ने इन्हें तुरंत रायपुर ले जाने की सलाह दी थी.. लेकिन जिस हेलिकॉप्टर से इन्हें ले जाना था उस पर जाने के लिए राज्य के वन राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल हड़बड़ी में थे। लिहाजा ये जवान इलाज के लिए रायपुर पहुंच ही नहीं पाए और जगदलपुर में ही इनकी मौत हो गई

खबर नंबर दो--- जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के एक हिस्से में बने मां चामुंडा के मंदिर में भगदड़ मच गई औऱ पहले नवरात्र के मौके पर माता के दर्शन के लिए आए भक्तों में से 147 की मौत हो गई। मंदिर में भगदड़ की ये कोई पहली घटना नहीं है। लेकिन इस हादसे की एक वजह ये भी बताई जा रही है कि मंदिर में श्रद्धालुओं को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षाकर्मी वहां मौजूद नहीं थे। क्योंकि पुलिस महकमे के ज्यादातर आला अधिकारी उस वक्त मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तीमारदारी में जुटे थे जो कहीं और पूजापाठ कर रही थीं।
वैसे तो लोकतंत्र की अच्छाइयां गिनाने के लिए विद्वानों के पास इतनी दलीलें होंगी कि मेरे सवाल औंधे मुंह आ गिरेंगे लेकिन फिर भी लोकतंत्र से जुड़े इन दो सवाल का जवाब मैं जरूर चाहूंगा..
सवाल नंबर एक-- अंग्रेजों के जमाने में गुलामी कानून था हमने उसके खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी औऱ आजादी के नाम पर लोकतंत्र का ईनाम पाया क्या ये वही लोकतंत्र है?
सवाल नंबर दो--लोकतंत्र के चार पाये में से एक है राजनीतिक सिस्टम...लेकिन इस सिस्टम ने लोकतंत्र को हाइजैक करके इसे आम आदमी के लिए परलोकतंत्र बना दिया है..जहां एक तरफ लकवे का शिकार प्रशासन है और दूसरी ओर वोट देकर इस बनाए रखने को बेबस जनता...और इन सबके बीच तेजी से सिर उठा रही है मौकापरस्तों की फौज.. वो मौकापरस्त जो किसी विचारधारा, किसी महत्वाकांक्षा या फिर अपनी दिक्कतों की दुहाई देकर लोगों को मौत के मुंह में धकेल रहे है। लोकतंत्र के नाम पर तेजी से सड़ रहे इस सिस्टम में इन मौकापरस्तों से लड़ने की कुछ गुंजाइश बची है क्या ?
ये वो सवाल हैं जो हर दिन जाती हुई जिंदगियों औऱ हर रोज तबाह होते किसी परिवार से सीधे जुड़े हैं.. संविधान में मौलिक अधिकारों के नाम पर जितने अनुच्छेद लिखे गए.. उससे हमेशा यही आस रही कि हर किसी को जिंदा रखना भले ही मुमकिन ना रहे ..लेकिन बेमौत मरने से रोकने की तो कोशिश जरूर की जाएगी.. जगदलपुर में जिन दो जवानों की बेहद लाचारगी में मौत हुई उनका कसूर क्या था... वो नक्सलियों वाले इलाके में राष्ट्रपति की सुरक्षा में लगाए गए थे या फिर उनका ओहदा इस लायक नहीं था कि उनकी जिंदगी बचाने को प्राथमिकता दी जाए.. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी राजनीतिक दल की जिला इकाई का कोई चूरनछाप नेता भी राष्ट्रपति के दौरे के बीच इस तरह के ब्लास्ट में घायल होता तो उसे बचाने के लिए राज्य का पूरा प्रशासनिक अमला ऐड़ी चोटी का जोर लगा देता..लेकिन ये जवान थे सीआरपीएफ के जवान..वो जवान जिनकी जिंदगी की अहमियत कुर्बानी के बाद ही पहचानी जाती है..लेकिन ये कैसी कुर्बानी जिसमें बेमौत मरने की बेचारगी दिखाई देती है..क्या इस तरह की खबरे सुनकर सेना और अर्धसैनिक बलों में काम करने वाले लाखों जवानों का मनोबल नहीं गिरता होगा.. जो मां-बाप इन खबरों को पढ़ते होंगे वो तो अपनी औलादों को अर्धसैनिक बलों में भेजने का ख्याल भी जेहन में लाने से बचेंगे...लेकिन अफसोस की बात ये है कि इस तरह के हादसे हमारे देश के नेताओं पर जरा भी असर नहीं डालते..
दूसरे वाकये में तो जिन लोगों की मौत हुई वो बेचारे तो भगवान के दर पर गए ही थे अपने और अपने परिवार की सलामती की दुआ करने.. लेकिन उन बेचारों को क्या पता था कि इस देश में उनकी जिंदगी भगवान के नहीं राजनेताओं के रहम के भरोसे है.. उन राजनेताओं के भरोसे जिन्हें भले ही वो अपना रहनुमा चुनते हैं लेकिन इस देश में वो भगवान से भी ज्यादा ताकतवर हैं.. और ऐसे हादसों के बाद उनकी ताकत की अहमियत कई गुना औऱ बढ़ जाती है...उनका कद इतना बड़ा है कि इस तरह के तमाम हादसों के बावजूद हमारा सिस्टम और हमारी एक अरब की आबादी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती औऱ वो बयानों की चादर ओढ़ कर आराम से सोते रहते हैं..
याद आ रहा है बिहार में बाढ़ की राष्ट्रीय आपदा.. एक ईमानदार अफसर ( मुझे इस वक्त उसका नाम नहीं ध्यान आ रहा) ने बिहार के अफसरों को लगातार एक हफ्ते तक इस बात की चेतावनी भेजी कि कोसहा बांध किसी भी वक्त टूट सकता है लेकिन रिसीविंग एंड पर मौजूद अफसर तो छुट्टी पर चल रहे थे औऱ उनके पीछे उनका काम संभाल रहे अफसर ने ऐसे संदेशों पर ध्यान तक देने की जरूर नहीं समझी..नतीजा वो लोग जो घरों में अपने बीवी बच्चों के साथ सो रहे थे या फिर इस सिस्टम के भरोसे थे,..बेमौत भगवान को प्यारे हो गए..लाखों जिंदगियां तबाह हो गई..किसी का बेटा गया तो किसी का घऱ बार..औऱ खबरों से फलता फूलता रहा हर रोज का अखबार...और इन सबसे बीच लालू यादव जैसे मीडिया के चहेते राजनेता अपनी राजनीति चमकाने में जुटे रहे।।। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि इन सबके बीच कभी ये खबर नहीं सुनाई पड़ी कि आखिर इस तरह की चेतावनी को नजरअंदाज करने वाले अफसरों का क्या हुआ? क्या उनके खिलाफ होमीसाइड का मामला दर्ज किया गया और इस तरह की गंभीर लापरवाही बरतने के जुर्म में उन्हें बर्खास्त करने की कार्रवाई शुरु भी हुई या नहीं?
जब मैं पढ़ाई कर रहा था तो कुछ हिंदी के कवियों से भी साबका पड़ा.. उनकी कविताई में भले ही कोई दम नहीं नजर आया लेकिन उनकी एक अदा पर मैं हमेशा फिदा रहा.. वो ये कि कितनी भी घटिया कविताई करो लेकिन मार्केटिंग शानदार करो.. और वो भी कुछ इस तरीके से. कि अगर दो कवि दोस्त हैं तो उनके बीच एक मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिग हमेशा दिखाई देती थी.. कि.. तुम मुझे पंत कहो और मैं तुम्हें निराला कहूंगा.. और इस तरह एक दूसरे के नाकारापन पर पर्दा भी पड़ा रहेगा औऱ महफिल में जमे भी रहेंगे
कुछ यही दिखाई देता है राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम की ट्यूनिंग में....जहां राजनेता प्रशासनिक सिस्टम की हर खामी को नजरअंदाज करते हैं और बदले में प्रशासनिक सिस्टम उन नेताओं को अपना उल्लू सीधा करने में भरपूर मदद करते हैं..लेकिन इन सबके बीच सिस्टम को शिकंजे में ले चुके भ्रष्टाचार का सहारा लेकर देश को तोड़ने वाली ताकतें जो तबाही मचा रही हैं उसका शिकार हो रही है बेबस लाचार जनता...
दरअसल गौर से देखा जाए तो ये एक दुष्चक्र की तरह नजर आता है जिससे निकलने का कोई रास्ता नहीं..बस उम्मीद की एक किरन है जो वहां से आती दिखाई दे रही है जहां चंद अच्छे लोग ईमानदारी से इस कोशिश में लगे हैं कि आवाज उठाओ.शायद कभी ये आवाज अपना असर दिखाए और बेमौत मरती जिंदगियों को बचाने की ठोस कोशिश हो.. तब तक तो ये देश और इसकी जनता भगवान के ही भरोसे है.....
आपका हमसफर
दीपक नरेश

रविवार, 21 सितंबर 2008

इस्लामाबाद में आत्मघाती हमला


पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के मैरियट होटल के बाहर हुए आत्मघाती हमले में 54 लोगों की मौत हुई। मरने वालों में चेक गणराज्य के राजदूत इवो जदरैक भी शामिल हैं। इसके अलावा कई विदेशी नागरिक भी इस हमले में मारे गए। इस हमले में घायलों की तादात भी सैकड़ों में है। दुनियाभर के देशों ने इस हमले की कड़ी निंदा की है और आतंकवाद के खात्मे के लिए एकजुट होकर लड़ने की अपील की है। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि उसे हमले की पूर्व जानकारी थी और इस बात की आशंका के मद्देनजर सुरक्षा के सभी इंतजाम किए गए थे। लेकिन ब्लास्ट के बाद के हालात को देखने के बाद तो ये कतई नहीं कहा जा सकता कि सुरक्षा के माकूल इंतजाम का पाक सरकार का दावा सही है। ऐसे में सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस इलाके में विस्फोट की घटना कई बड़े सवाल खड़ी करती है..मसलन क्या ये पाकिस्तानी जमीन पर अमेरिकी कार्रवाई की प्रतिक्रिया है या फिर कुछ और.. लेकिन एक दिलचस्प जानकारी जो मैं आपसे बांटना चाहूंगा.. पाकिस्तान के एक मशहूर टीवी की एंकर ने खबर पढ़ते वक्त दिल्ली धमाकों का जिक्र कुछ यूं किया.. पाकिस्तान में अबतक का ये सबसे बड़ा आत्मघाती हमला है और जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे पड़ोसी मुल्क हिंदोस्तान की राजधानी दिल्ली में अभी हाल ही में बम धमाके हुए हैं ऐसे में इस आतंकवादी हमले के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता कि इसे किसने अंजाम दिया.. इस बीच हमारे एक पत्रकार दोस्त ने खबर दी कि उसने पाकिस्तान हाई कमीशन में एक परिचित को फोन कर जानकारी चाही कि आखिर ये ब्लास्ट हुआ कैसे और इसके पीछे कौन है लेकिन हमारे पत्रकार बंधु का फोन जैसे ही उन महाशय ने उठाया..बिना हेलो हाय किए सीधे इन्ही से पूछ लिया कि ....भाई आप लोगों ने ये क्या करा दिया....
दूसरा पहलू.-- अब तक की जानकारी के मुताबिक इस हमले के पीछे तहरीक-ए-तालिबान के मुखिया बैतुल्लाह महसूद का हाथ बताया जा रहा है। वजीरिस्तान के आसपास के कबाइली इलाकों में अमेरिकी हमले से खासा बिफरे इस कट्टरपंथी संगठन के निशाने पर पाकिस्तानी हुक्मरान पहले से ही रहे हैं। ऐसी खबरें है कि पिछले कई महीने से इन कबाइली इलाकों में कार्रवाई को अंजाम दे रहे पाकिस्तानी सैनिकों से ये बेहद बेरहमी से पेश आते हैं। इनके हाथों अब तक कई पाकिस्तानी सैनिक हलाक हो चुके हैं.. अमेरिकी से इनकी नाराजगी अब अपने मुल्क के हुक्मरानो के साथ-साथ अवाम से भी होती जा रही है खासकर उन लोगों से जो कट्टरपंथ के खिलाफ गठबंधन सेनाओं की कार्रवाई को जायज ठहरा रहे हैं। पाकिस्तान की सरकार भी कह रही है कि इन आतंकवादियों का किसी धर्म समुदाय से कोई लेना देना नहीं है और आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा।
और अब मतलब की बात... पाकिस्तान के हुक्मरान, वहां की फौज और आईएसआई सब इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ है कि मैरियट पर आत्मघाती हमले के पीछे किसका हाथ है। लेकिन नजरिये में बदलाव लाए बिना क्या आतंकवाद का एकजुट होकर मुकाबला करना मुमकिन है समझने वाली बात ये है कि क्या उनका आतंकवाद हमारे मुल्क के आतंकवाद से अलग है क्या उनके यहां होने वाले आतंकवादी हमले हमारे यहां अवाम की रूह में दहशत बनकर घुसपैठ करने में जुटे आतंकी मंसूबों से अलग हैं। हमले कहीं भी हो मरने वाले हमेशा बेकसूर लोग होते हैं.. परिवार के परिवार तबाह हो रहे हैं और ऐसा किसी एक मुल्क में नहीं बल्कि उन देशो में भी हो रहा है जिनके सुरक्षा इंतजामात हमसे भी कहीं ज्यादा बेहतर हैं। ऐसे में मुसीबत के दौर में अगर तेरे-मेरे की मानसिकता देखने को मिले तो इसे क्या कहेंगे...चैनल की न्यूज रीडर हो या सरकारी नुमाइंदे.. हिंदोस्तान में हो या पाकिस्तान में ...सभी को ये समझने की जरूरत है कि ये लड़ाई मानवता के खिलाफ खड़े हो रहे एक ऐसे राक्षस से चल रही है जो वायरस बनकर दुनियाभर के अलग-अलग मुल्क में रहने वाले तमाम इंसानों के जेहन में पैबस्त होने की कोशिश में जुटा है और अपने मंसूबे को कामयाब बनाने के लिए हर किसी को अलग-अलग तरीके से बहला-फुसला रहा है।
आपका हमसफर
दीपक नरेश

शुक्रवार, 19 सितंबर 2008

इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की मौत



मोहनचंद नहीं रहे..एक इंस्पेक्टर की मौत.. दिल्ली पुलिस का इंस्पेक्टर,, जिसकी काबिलियत ने हम जैसों को महफूज रखा.. लंबे वक्त तक.. जिसका नाम भी हम शायद नहीं जानते थे आज उसकी मौत के बाद पता चला कि वो तो हिंदुस्तानियों का रखवाला था.. खामोशी से ले ली विदाई..बेरहम वक्त ने अचानक ही उसे हमसे छीन लिया..या सड़े हुए सिस्टम में रहने का उसने खामियाजा भुगता ..वो एक जांबाज अफसर था.. अपना फर्ज निभाते..निभाते उसने जान.. दे दी.. मोहनचंद शर्मा अचानक ही देश का हीरो बन गया.. जिंदगी की कुर्बानी देकर..जिसके बारे में हमारे पत्रकार दोस्तों का कहना है कि पिछले कई सालों में देश की राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में आतंकवादियों से जितनी भी बड़ी छोटी मुठभेड़ हुई.. मोहनचंद शर्मा हमेशा उसका हिस्सा रहे.. उनकी दिलेरी का लोहा पूरा पुलिस महकमा मानता था..इतना ही नहीं...मोबाइल सर्विलांस पर उनकी समझ का लोहा दूसरे राज्यों की सुरक्षा ऐजेंसियां भी मानती है.. उनकी निशानदेही और जानकारियों के बलबूते कश्मीर और गुजरात पुलिस ने कई बड़े आतंकवादियों को मार गिराने में कामयाबी हासिल की..वो मोहन चंद शर्मा अब नहीं है..खबरों की दुनियां में आज उनका नाम सुर्खियों में है.. और कल के अखबार भी उनकी बहादुरी से रंगे रहेंगे.. लेकिन वो सवाल जो मोहनचंद पीछे छोड़ गए उनके जवाब कैसे तलाशे जाएंगे...कौन देगा उनके जवाब..देश के राजनेता स्वार्थी हैं.. देश का गृहमंत्री एक आम नागरिक से भी ज्यादा लाचार ..सिस्टम में इतने छेद है कि उनमें पैबंद लगाने की गुंजाइश की नहीं बची और आम आदमी के सिर पर दिक्कतों का इतना बोझ कि चंद सवाल ढोने भर की कूबत शायद उनमें नहीं..इन सब के बीच आतंक का साया हमारी रूह के करीब पहुंच रहा है.. देश के राजनेता तो महफूज हैं सुरक्षा घेर में और मर रहा है आम आदमी..शायद ये विडबंना ही है कि घड़ियाली आंसू बहाने में महारत रखने वाले इन राजनेताओं को समझ नहीं आ रहा कि ये राजनीति करने का वक्त नहीं है और मौत के इन कारोबारियों पर अगर वक्त रहते रोक नहीं लगी तो यूं ही परिवार के परिवार तबाह होते रहेंगे। मोहनचंद जैसे जांबाज अफसर की भरपाई आसान नहीं..अब भी अगर नहीं चेते तो कब चेतेंगे..
शहीद इंस्पेक्टर मोहनचंद को श्रद्धांजलि
आपका हमसफर
दीपक नरेश

सोमवार, 4 अगस्त 2008

भीड़ में एक चेहरा

कतरा होकर भी तूफां से जंग लेता हूं. मुझे बचाना समंदर की जिम्मेदारी है..दुआ करो कि सलामत रहे हिम्मत मेरी.. ये चिराग कई आंधियों पे भारी है.. वसीम बरेलवी ने जब ये शेर कहा होगा तो शायद उन्हें इस बात का एहसास जरूर रहा होगा कि बुराई के खिलाफ बोलने कहने और लड़ने वाले के लिए कितनी ताकत और हौसले की जरूरत होती है.. जेहानी और उससे भी ज्यादा शायद रूहानी ताकत के सहारे की.. आज कई हफ्तों बाद ब्लॉग पर लिखने का मौका जुटा पाया हूं तो सोचा क्यों ना उस आदमी की बात की जाए जो मेरे लिए भले ही अजनबी है लेकिन उसकी तबीयत के लोगों का कद्रदान होना मेरे लिए किसी खुशकिस्मती से कम नहीं.. नाम है उनका राजेश अग्रवाल और उनका ब्लॉग है सरोकार जिसका पता है.. http://sarokaar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html आज यूं ही नेट पर चहलकदमी करते उनके ब्लॉग पर जा पहुंचा... जहां उन्होंने छत्तीसगढ़ के सरगुजा और जशपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में पांव पसार रही या फिर कहें बेइंतहा गरीबी के बाईप्रोडक्ट के तौर पर पैदा हो रही एक ऐसी बीमारी का जिक्र किया है जो इन लोगों की जिंदगी को नरक बनाए दे रही है। कभी टमाटर की खेती के लिए मशहूर इस इलाके के लोगों की नाबालिग लड़किया गरीबी के चलते देह व्यापार के धंधे में उतारी जा रही हैं और वो भी नौकरी का लालच देकर हालांकि उरांव आदिवासियों के इलाके से इस तरह की खबरें पहले भी आती रही हैं लेकिन छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाए जाने के बाद ये उम्मीद जागी थी कि आदिवासियों की बेहतरी के लिए राज्य सरकार जरूर कुछ करेगी लेकिन इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अगर हालात ज्यों के त्यों हैं तो ये वाकई चिंता की बात है...राजेश जी ने जो कुछ लिखा है उससे एक बात तो साफ है कि वर्तमान हालात के लिए सीधे तौर पर वो लोग जिम्मेदार हैं जो इन इलाकों में खेतीबाड़ी से रोजी रोटी पैदा करने के साधनों को पनपने नहीं दे रहे जिसके चलते यहां की मासूम लड़कियों को इस नरक में ढकेलने के लिए नौकरी का लालच दिखा कर महानगरों में लाया जा रहा है और फिर देहव्यापार के कारोबार में ढकेल दिया जाता है.. राजेश जी ने उरांव आदिवासियों की जिंदगी को कैंसर की तरह हर पल तबाह कर रही इस बीमारी को जितनी तफसील से बयां किया है वो हालात को उजागर करने के लिए काफी है... उनकी इस कोशिश का एक सकारात्मक पहलू ये है कि उन्होंने वो सब लिखा है जो एक आवाज बनकर उन लोगों तक पहुंच सकता है जो इसे रोकने के लिए वाकई बहुत कुछ कर सकते हैं..
आपका हमसफर
दीपक नरेश

शनिवार, 28 जून 2008

रियालिटी या क्रूएलिटी शो

आज टीवी रियलिटी शो के एक ऐसे पहलू का दीदार हुआ जो बेहद भयावह है....रंगीन सपनों की दुनिया जैसे नजर आने वाले इन रियालिटी शो की एक प्रतिभागी शिनजिनी को अपने हुनर और काबिलियत का जो ईनाम मिला उसने उसकी जिंदगी की तमाम खुशियां छीन ली..एक जिंदा लाश बनकर रह गई है शिनजिनी.. जिसने भी शिनजिनी को परफार्म करते देखा होगा उसको याद होगा शिनजिनी की मुस्कान उसका मासूम चेहरा उसकी खनकती आवाज और उसका बेहतरीन डांस.. लेकिन रियालिटी शो से निकाले जाने का सदमा शिनजिनी नहीं सह पाई..शिनजिनी ना केवल गहरे डिप्रेशन की शिकार हो गई.. उसको लगे सदमें का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उसने खाना-पीना तक छोड़ दिया औऱ एक दिन उसकी आवाज भी चली गई.. कहते हैं इसके पीछे शो के जजों के तीखे कमेंट्स भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जो सोलह साल की शिनजिनी की जिंदगी को खुशियों से बेजार कर गए.. शिनजिनी को करीब डेढ़ महीने पहले रियालिटी शो से बेदखल किया गया था लेकिन तब उसकी तबीयत ऐसी बिगड़ी कि फिर शिनजिनी संभल ही नहीं पाई.. कोलकाता की रहने वाली शिनजिनी का पहले स्थानीय अस्पतालों में इलाज कराया गया लेकिन बाद में उसकी मानसिक हालत ज्यादा बिगड़ने के बाद डॉक्टरों ने उसे बैंगलौर के स्पेशियलिटी अस्पताल निमहैंस रेफर कर दिया...फिलहाल शिंजनी बैंगलौर के निमहैंस अस्पताल में भर्ती है और ठीक होने का इंतजार कर रही है।
इस खबर का सबसे दर्दनाक पहलू ये है कि आजतक किसी भी रियालिटी शो की तैयारियों में किसी मनोवैज्ञानिक की सेवाएं नहीं ली गई..मैं ये आरोप इस लिए लगा रहा हूं क्योंकि मैंने कई बार उनके क्रेडिट रोल को गौर से देखा है(क्रेडिट रोल का मतलब शो में शामिल होने वाले लोगों और संगठनों की लिस्ट जो कार्यक्रम के अंत में दिखाई जाती है) लेकिन कभी भी किसी मनोवैज्ञानिक का नाम उस क्रेडिट रोल में पहचान के साथ नहीं दिखा....
और इस सब के बीच एक औऱ खराब बात....टीवी पर बुद्धिजीवी दिखने वाले इन तथाकथित जजों को तो कम से कम इतना संस्कार होना चाहिए था कि कुछ भी अंट-शंट बोलने से बचें इन बच्चों की प्रतिभा के साथ-साथ इनकी मासूमियत को भी तो सहेजा जाए..दुर्भाग्य है वो भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहे औऱ रियालिटी शो के जरिये पैसा कमाने वाले लोगों का तो कोई कसूर हो ही नहीं सकता उन्होंने तो सब्जीमंडी में दुकान खोली ही है पैसा बनाने के लिए..दुआ करें कि शिनजिनी जल्दी ही अच्छी हो जाए और अपने घर वापस जाए.. हम फिर से उसे हंसते खिलखिलाते टीवी पर नाचते गाते देखें..
आपका हमसफर
दीपक नरेश

शुक्रवार, 27 जून 2008

अंडमान में भूकंप



अंडमान निकोबार में भूकंप के झटके आए हैं रिक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 6.7 मापी गई। ये भूकंप आज दोपहर में आया.. इसका केंद्र अंडमान से 150 किलोमीटर दूर समंदर में था..हालांकि इस भूकंप से जान-माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है लेकिन सुनामी की आशंका से लोगों में दहशत औऱ खौफ पसरना स्वाभाविक है.. इस भूकंप की तीव्रता करीब करीब उतनी ही थी जितना गुजरात के भुज में आए भूकंप की थी.. भुज में भूकंप की तीव्रता 7.9 थी और वहां जिस कदर तबाही हुई थी उससे अंडमान और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों में डर फैलना स्वाभाविक है...वैसे भी समुंदर में जब कभी भूकंप आता है तो सुनामी लहरें पांच- छह घंटे बाद ही फैलना शुरु करती हैं ऐसे में सुनामी की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता....वैसे इंडिया में सुनामी वार्निंग सेंटर ने अबतक किसी भी तरह की चेतावनी या अलर्ट जारी नहीं किया है लेकिन इन इलाकों में रहने वालों में खौफ और दहशत का माहौल ना बने इसके लिए उसे जरूरी जानकारियां वेबसाइटों और दूसरे मीडिया माध्यमों के जरिये जरूर देनी चाहिए
आपका हमसफर
दीपक नरेश

एक थी आरुषि....



आरुषि हत्याकांड में सीबीआई भी मुश्किलों में घिरती नजर आ रही है। सीबीआई ने जिस तरह से इस हत्याकांड को ब्लाइंड मर्डर बता डाला उससे एक बात तो साफ है कि ये केस या तो अचानक ही सुलझ जाएगा या फिर कभी नहीं सुलझेगा..बीच में ये बात सामने आई कि डॉक्टर तलवार हत्याकांड के बारे में कुछ ना कुछ जरूर जानते हैं लेकिन वो बताना नहीं चाहते वहीं डॉक्टर तलवार के कंपाउंडर कृष्णा को भी हत्यारा साबित करने में सीबीआई कामयाब नहीं हो पा रही है.. साथ ही वारदात में नौकरों की भूमिका को लेकर जो थ्योरी बनाई जा रही है उसमें भी इतने पेंच नजर आ रहे हैं कि लगता ही नहीं है कि इस तरह से सीबीआई हत्यारे का पता लगा पाएगी। दरअसल मामले की तह में जाकर देखें तो हत्याकांड के अगले दिन जिस तरह से जल्दबाजी में सबूतों को मिटा दिया गया..उससे किसी भी जांच ऐजेंसी को काम करने में दिक्कते खड़ी होनी ही थी..अबतक इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में जो कोशिशें हुई हैं उन्हें सिलसिलेवार ढंग से देखें तो एक बात समझ में आती है कि शुरुआती दौर में जब डॉक्टर राजेश तलवार को कातिल बताया जा रहा था तो उन्हें कातिल साबित करने के लिए जरूरी सबूत नहीं जुटाए जा सके..उसके बाद दुर्रानी परिवार पर शक गया तो उन्हें हत्यारे से ताल्लुक रखने या हत्या की जानकारी होने की बात साबित नहीं हो पाई..दरअसल दुर्रानी परिवार तो तलवार परिवार से ताल्लुक रखने के चलते बदनाम हो गया,.. यूपी पुलिस की लापरवाही से ना केवल उस परिवार का सोशल मर्डर हो गया बल्कि डॉक्टर अनिता दुर्रानी को मैक्स हॉस्पिटल ने अपने एडवाइजरी पैनल से भी बेदखल कर दिया नाम तो गया ही कमाई का जरिया भी बंद हो गया....अब बात करते हैं कृष्णा की.. तो कृष्णा को सीबीआई भले ही कातिल बता रही हो लेकिन सीबीआई को भी पता है की जरूरी सबूत जुटाए बिना वो अपनी बात साबित नहीं कर पाएगी...और अब राजकुमार और दूसरे नौकरों की बात.. नौकर इस वारदात में शामिल हो सकते हैं इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन कोई नौकर किसी लड़की को उसी के घर में जबकि पास के कमरे में लड़की के मां बाप सो रहे थे..अचानक की मार डालने का जोखिम उठा लेगा..ये मुमकिन नहीं लगता और दूसरी बात इतने दिनों बाद भी जो नौकर आसानी से गिरफ्त में आ जा रहे हैं वो अगर कातिल होते तो पुलिस के शिकंजे में इतनी आसानी से नहीं आते.. चाहे जो हो आरुषि हत्याकांड का राज कब खुलेगा ये तो कोई नहीं जानता लेकिन जानने की दिलचस्पी तबतक इसी तरह बनी रहेगी..
आपका हमसफर
दीपक नरेश

बुधवार, 25 जून 2008

खबरें ये भी हैं....



बिहार में चर्चित इंजीनियर सत्येंद्र दूबे हत्याकांड का मुख्य आरोपी पुलिस हिरासत से फरार हो गया..
और किडनी किंग अमित कुमार को जमानत मिल गई..दोनों ही खबरें मीडिया में जगह नहीं बना पाईं,.. हालांति जब ये वारदातें हुई थीं या इनका खुलासा हुआ था तो ये मीडिया में अहम सुर्खियां बनी थी कई दिनों तक टीवी और समाचार पत्र पत्रिकाओं में दोनों ही खबरें छाई रहीं लेकिन सत्येंद्र को इंसाफ दिलाने में प्रशासन और पुलिस की कितनी दिलचस्पी रही इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सत्येंद्र दूबे हत्याकांड का आरोपी पुलिस की आंखों में धूल झोंक कर फरार हो गया...इसी तरह किडनी कांड की सही तरीके से जांच हो रही है या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन गैरकानूनी तरीके से लोगों की किडनी निकालकर बेचने के धंधे का आरोपी ही इतनी आसानी से जमानत पा जाता है तो ये सिर्फ जांच एजेन्सियों की लापरवाही और पुलिस के गैरजिम्मेदाराना रवैये के चलते ही मुमकिन है.. आखिर क्या हो गया कि अदालत में पुलिस और जांच एजेंसियां कायदे से पैरवी नहीं कर पाई.. एक मामूली सा सर्जन कनाडा में बंगला खरीद कर रह रहा है फिल्मों में पैसा लगा रहा है और तो और इतने संगीन आरोपों से घिरा है मगर जांच होने तक उसे हिरासत में रखने में जांच एजेंसियां नाकाम रहीं और पुलिस प्रशासन का क्या कहना...पहले ही कई पुलिसवालों से इस डॉक्टर के लेन-देन के मामले उजागर हो चुके हैं..ऐसे में अगर वो पुलिस के शिकंजे से बाहर है तो सबूतों के साथ होने वाली छेड़छाड़ क्या कभी उन लोगों को इंसाफ दिला पाएगी..जो किडनी कांड के शिकार हो चुके हैं...या फिर सत्येंद्र को ईमानदारी दिखाने की जो सजा दी गई..क्या उसके घरवालों का भरोसा सिस्टम में बना रह पाएगा..और सबसे बड़ी बात ये इन सवालों का जवाब ढूंढने में किसी मीडिया वाले या फिर पुलिस प्रशासन के किसी अफसर की दिलचस्पी होगी.....
आपका हमसफर
दीपक नरेश

सोमवार, 16 जून 2008

कहानी आरुषि की...



आरुषि की मौत का राज अब तक नहीं पता चल पाया है.. सीबीआई रोज नई नई कोशिशों की बदौलत ये साबित करने की कोशिश कर रही है.. कि जांच जिस दिशा में जा रही है उससे हत्यारे का पता जल्दी ही चल जाएगा..लेकिन अब भी उसे तलाश है किसी ठोस सबूत की जिसके बिना पर वो ये साबित कर सके कि जांच महज हवाबाजी नहीं है....हालांकि सीबीआई के लिए ये केस भी अबतक के सबसे दुरूह वारदातों में से एक साबित हो रहा है इसमें कोई शक नहीं लेकिन मीडिया के दखल औऱ हर पल की खबर जनता तक पहुंचने से उसके हाथ-पांव भी फूलते नजर आ रहे हैं.. मीडिया में आकर जांच के बारे में बयान देते रहने का दबाव जहां उसके काम पर असर डाल रहा है वहीं लोगों की बेकरारी बढ़ती जा रही है ये जानने की आखिर हत्यारा कौन है...आज केस पर सीबीआई के अफसर के बयान से ये साफ है कि जांच अभी कुछ और वक्त लेगी.. साथ ही यूपी पुलिस पर सीबीआई की टिप्पणियों से ये तो साफ है कि पुलिस ने जिस तरह का गैरजिम्मेदाराना रवैया दिखाया उसने समूचे केस की ऐसी की तैसी कर दी...पुलिसवालों से जनता का भरोसा जिस तरह उठता जा रहा है वो ठीक नहीं..कम से कम बदनामी के जितने दाग यूपी पुलिस पर लग रहे हैं उससे तो साफ है कि इस महकमे में सुधार के लिए कोई सख्त कदम उठाए जाने चाहिए...ये सही है कि पुलिस को कई बार बेहद खराब परिस्थितियों से भी दो चार होना पड़ता है लेकिन वहीं तो उनकी काबिलियत औऱ कर्तव्य परायणता की परीक्षा होती है.. इस केस के बाद भी यूपी पुलिस अगर सबक नहीं लेती और गैरजिम्मेदाराना रवैया रखने वाले पुलिसवालों पर कार्रवाई नहीं करती.. तो इससे यूपी पुलिस की बची-खुची साख भी खत्म हो जाएगी... हालांकि मायावती सरकार की जो कार्यशैली है उससे लगता नहीं है कि कुछ कार्रवाई होगी लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है. और अच्छे की उम्मीद तो हमेशा बनी रहती है..आज बस इतना ही..अलविदा
आपका हमसफर
दीपक नरेश

रविवार, 15 जून 2008

उफ ये 'टेरेफिक' सिस्टम...




दिल्ली का एक ही दर्द है..यहां पर हर सेवा सर्विस है और उस सर्विस की कीमत वसूलने में कोई मुरव्वत नहीं बरती जाती...फिर चाहे वो लोक सेवा हो या जन सेवा...हालांकि उसूलों को किताबी बातें मानने वालों को ये बेतुकी लग सकती है मगर जिसके लिए जिंदगी जद्दोजहद से कम नहीं उनके लिए ये कीमत वसूली एक सजा बन जाती है...मध्यमवर्ग के लिए तो ऐसी दुश्वारियों की एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त ही बनाई जा सकती है.. अभी का एक वाकया बताता हूं आपको.. एक आदमी अपने परिवार के साथ मारुति 800 में शायद कनॉट प्लेस घूमने आया था....कार नई थी और उसमें एक भरा पूरा परिवार मौजूद था..जैसा कि हम विज्ञापनों की होर्डिंग्स में देखते हैं...विज्ञापनों की रंगीन दुनिया से झांक रहे सपनों की तरह इस कार में बैठे दो मासूम भी अपने बाहर की दुनिया को बड़े गौर से निहार रहे थे.. सुख उनके चेहरे से टपक रहा था औऱ रेड लाइट पर उनके ठीक पीछे अपनी कार में मौजूद मैं उनकी मासूमियत को देख रहा था... ट्रैंफिक सरकना चालू हुआ तो मेरी कार उनके पीछे थी..लेकिन एक जगह उनको शायद दिशा भ्रम हुआ कि उनको जाना किधर है ... ये मंटो ब्रिज के पास का वाकया है..उन्होंने अपनी कार रोकी और बैक करके पास में जा रहे एक साइकिल वाले से रास्ते के बारे में पूछना शुरु ही किया था..कि अचानक एक ट्रैफिक सिपाही वाला कूद कर उनके सामने आ खड़ा हुआ.. उसने बिना कुछ पूछे रसीद काटी और कार चालक के हाथ में थमा दी..कार चालक महोदय लाख कहते रहे कि उन्होंने कार बैक की थी रास्ता पूछने के लिए ..लेकिन ट्रैफिक पुलिस का वो कांस्टेबल मानने को तैयार नहीं दिखाई दे रहा था..मैं उनकी बातचीत का नतीजा क्या रहा ये तो नहीं जान पाया लेकिन एक बात जो मुझे समझ नहीं आई कि ट्रैफिक सिपाही को ऐसी क्या जल्दी थी कि बातचीत किए बिना या जरूरी कारण जाने बिना उसने चालान की पर्ची काटी.. दूसरी बात उनके ऊपर जिम्मेदारी है ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त रखने की और वो ये काम एक जनसेवा के तहत करते हैं जिसके लिए उन्हें पगार दी जाती है औऱ उस पगार का पैसा सरकार लोगों से टैक्स के नाम पर वसूलती है.. ऐसे में चालान काटने के लिए ही ड्यूटी करना कौन सी कानून व्यवस्था है..अगर उसे लगता था कि उस आदमी ने ट्रैफिक नियम तोड़ा है तो उसे साइड में रोककर पूछताछ करना चाहिए था फिर चालान काटना शायद मुनासिब होता लेकिन बिना बात चालान काटने की कार्रवाई तो किसी तरह से वाजिब नहीं कही ता सकती ..क्या ट्रैफिक सिपाही वसूली के लिए ही ड्यूटी कर रहे हैं और अगर ऐसा हो रहा है तो ये बेहद खराब बात है...मेरा मानना है आम आदमी की कमर महंगाई की मार से पहले से ही टूटी हुई है ऐसे में उसे हर मोड़ और हर चौराहे पर लूटने का .ये तथाकथित कानूनी इंतजाम ठीक नहीं... ताज्जुब है इसके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई जाती.. क्या दुनिया के दूसरे विकसित या विकासशील देशों में भी ट्रैफिक बंदोबस्ती के नाम पर ये अंधेरगर्दी चल रही है।
आपका हमसफर


दीपक नरेश

शनिवार, 31 मई 2008

चरैवेति..चरैवेति यानी चरते रहो..चरते रहो



एक जगह बांग्लादेशी हमसे बाजी मार गए...ये हुनर तो हमारे नाम पेटेंट होना चाहिए था..ऐसी कलाकारी के लिए तो हमारे देश के राजनेता ही कुख्यात..माफ कीजिएगा विख्यात हैं.. फिर बांग्लादेश इस बार कैसे बाजी मार गया.. जब ये खबर हमारे देश के नेताओं के कानों तक पहुंची तो उन्हें बेहद अफसोस हुआ.. ..लेकिन ये अचंभा हुआ कैसे...कहां हुई चूक..हर जगह भारी पड़ने वाले नेताओं के लिए ये मौका हाथ से कैसे निकल गया...नेताओं का जमावड़ा हुआ..सब जुटे और मिलबैठकर दिमागी घोड़े--गदहे जो भी होते हैं दौड़ाना शुरु कर दिया.. आखिर हमारे रहते इस पिद्दी से देश की ये मजाल कि जो खबर हममें से किसी की तारीफ से जुड़ी होनी चाहिए थी उसमें उनकी फोटू और नाम चमक रिया है.....चंद नेता जिनको अब तक पता भी नहीं था कि माजरा क्या है चुपचाप टुकटुकी लगाए हर बोलने वाले शख्स की सूरत निहार रहे थे..मन ही मन कुलबुला रहे थे कि काश एक बार मुद्दा पता चल जाता तो किसी को बोलने का मौका ही नहीं देता..हर किसी की डुग्गी बजा देता...मुझसे बड़ा बातूनी अफलातून कोई है यहां पर.. एक बार मुद्दा हाथ लग जाता तो ऐसा बोलता ऐसा बोलता कि सबकी बोलती बंद कर देता.....तभी एक आवाज हवा में गूंजी..खाआआआआ...मोशशशश.. मतलब साफ था मुद्दे का खुलासा होने वाला था.. एक कद्दू जैसी काया और बैगनी रंग से सराबोर नेता ने बामुश्किल बदन संभाल रहे पैरों को एक दूसरे का सहारा दिया और बैठे हुए सभी नेताओं के बीच से उठकर अंतरिक्ष से अपनी दूरी तनिक कम की...जुबान की गरदन गुटखा सहलाते सहलाते पहले ही टें हो चुकी थी सो उसी जुबान को मुंह में योगा कराने के बाद मुंह खोला और फिर फूटे चंद अल्फाज..भाइयों....नेता जाग चुके थे..मुंह खुल चुका था मुद्दा बस अब एक ही पल में हवा में अवतार लेने वाला था.....नेता जी जारी हो चुके थे.....ये बेहद अफसोस की बात है कि हम नेताओं के साफ सुथरे काजली इतिहास में कभी भी ऐसा मौका नहीं आया जब इतनी ज्यादा शर्मिंदगी और जलालत झेलनी पड़ी हो...हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना जो हम नेताओं के हुनर के मामले में हमारी मुंहबोली बहन लगती है.... उन पर भ्रष्टाचार के कुछ मुकदमें चल रहे थे...लेकिन आज ही ये ब्रेकिंग न्यूज मिली की उनके मुकदमें के अहम कागजात दीमक चाट गए...उनके वकीलों ने विशेष अदालत में जिरह के दौरान बताया कि कई पन्ने तो इतनी बुरी तरह खराब हो चुके हैं कि उन्हें पढ़ा ही नहीं जा सकता.....इतना ही नहीं इस बात की तस्दीक कराने के लिए कीड़ों की खाई फाइलों को अदालत में पेश भी किया गया..अब आप लोग ही तय कीजिए कि हिंदोस्तान में थोक के भाव हमारी जमात उपलब्ध है लेकिन ये यक्क आइडिया हम में से किसी के जेहन में क्यों नहीं आया.. सोचिए अगर ये फार्मूला हमारे हाथ पहले आ गया होता तो हमारे कितना सारे नेता भाइयों को जेल से अब तक छुड़ा लिया जाता उनको आजादी की खुली हवा में सांस लेने का मौका मिल जाता..हम में से कई बंधु कितनी तरह की तोहमत के साथ जी रहे हैं उनसे कब ना मुक्ति मिल जाती..
------मुद्दा सामने था.. सब शोक मना रहे थे कि ये फार्मूला अगर पहले ही उन तक पहुंच जाता तो कितना अच्छा रहता..आखिर आमराय ये बनी कि भले ही इस तरीके का इजाद बांग्लादेश में हुआ लेकिन इसको पेटेंट कराने की अर्जी दी जाएगी और ये साबित करने की कोशिश की जाएगी की ये फार्मूला चोरी का है और इसे हमारे देश से चुराया गया है ...इतना ही नहीं ये भी साबित करने की कोशिश की जाएगी कि काम के मामले में दीमक हमारे भाई हैं लिहाजा उनके सरंक्षण संवर्धन के लिए हर गांव गली कस्बे में एक संरक्षण केंद्र खोला जाएगा.. ताकि देश की तकदीर बनाने में उनका भी सक्रिय योगदान लिया जाए.....
------ और इस प्रस्ताव के साथ बैठक का समापन हो गया।
आपका हमसफर
दीपक नरेश

ये काम नहीं आसां..बस इतना समझ लीजे.....



नेता ही किसी देश की तकदीर संवार सकते हैं..औऱ नेताओं की मौजूदगी से ही लोकतंत्र संवर-निखर सकता है..नेता माने नेतृत्व माने देश का विकास..माने सब का कल्याण...माने ब्ला-ब्ला.. अद्भुत संकल्पना..भारत जैसे महादेश के संविधान में ना लिखी गई एक सच्चाई...मगर जो संविधान के हर हिस्से में पैबस्त है..नेताओं की खामोश मौजूदगी. वो बात अलग है कि नेता शब्द की जो परिभाषा और पहचान बताई गई थी उसमे आमूल-चूल परिवर्तन हो चुका है.. नेता अब ने..टा हो चुके हैं...कार्पोरेट समाज में कार्पोरेट नेटा मौजूद हैं....वो हाईटेक हैं..उनको पढ़े लिखे लोगों की जाहिलियत का अंदाज लगाने का हुनर आ गया है..वो सर्व विद्यमान टाइप का माहौल बनाने में भी महारत हासिल कर चुके हैं..एक ही वक्त पर वो किसी टीवी शो में. इंटरव्यू में. नाइट पार्टी में. और किसी जली हुई बस्ती का मुआयना करते नजर आ सकते हैं... कई तो ये भी भूल चुके हैं कि वो निरक्षर से थोड़े ही ज्यादा साक्षर हैं...वो नित नए नए हुनर सीख रहे हैं..जनता के सेवक ये नेटा..अब अपनी कीमत का अंदाजा लगा चुके हैं औऱ खुद की नेटाई को बनाए रखने के लिए लोगों की औकात आंकने में भी गलती नहीं करते....लेकिन नेटा अभी ग्लोबल नहीं हो पाए हैं..कई नेताओं का ये दर्द गाहे-बगाहे दिख जाता है.. अभी मेरे एक पत्रकार मित्र ने मुझे एक दिलचस्प वाकया सुनाया,..उनके एक नेता से थोड़ा दोस्ताना ताल्लुकात हैं नेता जी अकसर अपनी पहुंच और अपने रसूख के किस्से मेरे पत्रकार मित्र को सुनाते रहते हैं...वैसे ये सच भी है.प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी में उनकी खासी हनक है..एक डेलिगेशन का सदस्य बनकर नेता जी हाल ही में लंदन गए थे.. वहां दस दिन बिताकर जब वो वापस लौटे तो मुंह उतरा हुआ था.. मित्र ने हाल पूछा तो उनका दर्द छलक आया.. बोले बंधु मैं अभी लंदन में रह कर आया हूं लेकिन वहां रहने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हम लोग कितने उम्दा किस्म के जाहिल और गंवार हैं...मित्र के बहुत कुरेदने पर बोले कि.. यार जब मैं हवाई जहाज मे चढ़ रहा था तो मेरा अंदाज ऐसा था मानो गांव वाली बस पर चढ़ रहा हूं..साला..प्लेन के दरवाजे पर पहुंचते ही हाथ अपने आप बस के दरवाजे पर लगे हत्थे को पकड़ने के लिए उठ गया. वहां खड़ी मोहतरमा ने अगर खुद को संभाला ना होता तो साला पिट ही जाता... लंदन पहुंचा तो हर वक्त दतून करने की ही तलब लगी रहती थी...खाना खाते वक्त ऐसा लगता था मानो आज दातून कुल्ला किया ही नहीं..ऊपर से सेमिनार और मीटिंग्स में भी बैठते थे तो ऐसा लगता था मानो किसी बाबा के प्रवचन सत्संग में शिरकत कर रहे हैं... दिमागी तौर पर जाहिल हैं भाई साहेब ऐसे में मंत्री कैसे बन पाएंगे..मेरा पत्रकार मित्र जो बेचारा बड़ी मासूमियत से सुन रहा था.. बोला निराश क्यों होते हैं नेता जी आप जैसे ही तो एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखते हैं और सच तो ये है कि आप में ऐब हैं तो आप को दिख रहा है...औऱ यही तो सुधारना है..खुद सुधार लीजिएगा तो बेहतर नहीं तो जनता सुधारती रहेगी..हर साल इलेक्शन में...मित्र की बात नेता जी के पल्ले नहीं पड़ी वो बेचारे गुद्दी ही खुजाते रह गए...लेकिन दिल की भड़ास निकालने के बाद की राहत जरूर उनके चेहरे पर नजर आ रही थी..
तो दोस्तों ये तस्वीर है उस सच्चाई की जिसे हमारे देश के नेटा ग्लोबल होने की कोशिश में झेल रहे हैं...हो सके तो उनका दर्द दूर करने में कुछ कल्चरल सहयोग देने की कोशिश कीजिए...

आपका हमसफर
दीपक नरेश

शुक्रवार, 23 मई 2008

उसूलों पर टिकने की कीमत


यूपी के मुख्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्रा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का फैसला किया है.. वैसे तो ये मामूली खबर है और किसी अखबार में एक कॉलम की जगह पाने लायक ना नजर आए लेकिन उनके इस फैसले की वजहें बेहद गंभीर हैं जो राजनीति और प्रशासन के उस गठजोड़ से ताल्लुक रखती हैं जो समूचे सिस्टम को सड़ाने पर तुला है। एक गैरसरकारी संगठन को लखनऊ में 70 एकड़ जमीन देने के मायावती सरकार के फैसले के खिलाफ इस अफसर ने आवाज उठाई..उन प्रशासनिक अफसरों को भी ललकारा जो राजनेताओं की चापलूसी करके अपनी दुकानदारी चमकाने पर लगे रहते हैं..शुक्रवार को मंत्रिमंडल की बैठक में इस बहादुर अफसर ने मुख्यमंत्री के मुंह पर कह डाला कि वर्तमान व्यवस्था में कई काम नियमों का उल्लंघन करके हो रहे हैं और इनके बारे में मंत्रिमंडल को अवगत कराया जाना चाहिए। जाहिर है जब फायदा मुख्यमंत्री के चहेतों को ही मिलने वाला हो तो ऐसी बात सुनकर उनका भड़कना लाजिमी है। लेकिन प्रशांत मिश्र ने अपनी टिप्पणी वापस लेने के मुख्यमंत्री के निर्देश को मानने के बजाय नौकरी छोड़ना बेहतर समझा..भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस के 1972 बैच के वरिष्ठ अधिकारी प्रशांत मिश्र एक ईमानदार और उसूलों पर टिके रहने वाले अधिकारी के तौर पर जाने जाते हैं औऱ उनके करीबी भी उनकी मिसाल देते हैं.. लेकिन लगता है मायावती जी को अब ईमानदार अफसरों की जरूरत नहीं रह गई।..तभी तो जिन गरीब और मजलूम लोगों की आवाज बनकर उन्होंने यूपी का सिंहासन हासिल किया था उनके लिए काम करने में सक्षम अफसरों का ये हाल किया जा रहा है। ..चापलूसों से घिरी मायावती को ये समझना चाहिए कि वो अंतिम सत्ता नहीं हैं अगर यही हाल रहा तो जिस जनता ने उन्हें ये गद्दी नवाजी है वही जनता उन्हें इस गद्दी से उतारने में देर नहीं लगाएगी..आपको याद होगा चंद रोज पहले मैंने आपको बेकारू नाम के एक आदमी का किस्सा सुनाया था..और आपको जानकर ताज्जुब होगा कि सूबे का मुख्यमंत्री दलित होने के बावजूद बेकारू की एफआईआर आजतक नहीं लिखी गई....
आपका हमसफर
दीपक नरेश

गुरुवार, 22 मई 2008

किलिंग है तो ऑनर कैसा?



नोएडा के आरुषि हत्याकांड की गुत्थियां सुलझने का नाम नहीं ले रही..पुलिस परेशान..मीडिया परेशान और जनता भी परेशान..हर कोई बस एक ही सवाल का जवाब चाहता है कि आरुषि को किसने मारा..रोज नई नई थ्योरियां आती रहती है..कभी किसी को कातिल बताया जाता है तो कभी शक की सुई घर वालों की ओर घुमाई जाती है.. अब खबर ये आ रही है कि पुलिस तहकीकात जिस ओर जा रही है उससे शायद ये साबित किया जा सके कि ये मामला ऑनर किलिंग का है.. जब पहली बार इस जुमले को सुना था तो शायद ध्यान नहीं दिया था लेकिन आज पूरे दिन ये दो शब्द ज़ेहन पर कब्जा बनाए रहे...क्या इनके व्याकरणिक गठजो़ड़ की तरह इन दो शब्दों का कोई रिश्ता भी हो सकता है पहला सवाल जो दिमाग में आता है कि अगर किलिंग ही हो रही है तो फिर ऑनर कैसा..और अगर ऑनर है तो किलिंग की जरूरत ही क्या.. पहली बार में जरूर अटपटा लगा खुद से ये सवाल पूछना लेकिन बाद में दिमाग किसी बौराए साधू की तरह अफलातूनी गुणा भाग में रम गया....किसी की जान ले लेने का हक किसी को कैसे मिल सकता है.. और अगर कोई ये अपराध करता है तो उसके लिए सम्मान कहां से बचा रहता है.. दुबारा से कोशिश करते हैं इस सवाल को सीधा करने की... अगर सम्मान की खातिर किसी की जान ले ली जाती है तो फिर आप अपराधी हो गए क्योंकि आपने कानून को तोड़ा या कहें कानून हाथ में लिया.. ऐसे में किसी अपराधी को कोई समाज सम्मान की नजर से क्यों देखेगा..जबकि अपराध करने वाले ने समाज में इज्जत बचाने या बनाए रखने के नाम पर ही वारदात को अंजाम दिया है...भई अनपढ़ और जाहिल लोग अगर ऐसा करें तो समझ में आता है लेकिन पढ़े लिखे जाहिल अगर ऐसा करते हैं और वो भी ऑनर किलिंग का सहारा लेकर तो उनके लिए एक ही सजा होनी चाहिए कि उन्हें सरेआम फांसी पर लटका दो.. वैसे जब इस शब्द की तह में जाने की कोशिश शुरु हुई तो तमाम ऐसी भी जानकारियां पल्ले आईं..जो दिल दहला देने वाली हैं। मसलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसी वारदातों की एक लंबी फेहरिस्त है जिसमें एक ही गोत्र में शादी करने वाले लड़के लड़कियों को ऑनर किलिंग के नाम पर मौत दे दी गई।. बिहार के गांवों और झारखंड के आदिवासी इलाकों में ये आम बात है.. गुजरात के बनासकाठा औऱ राजमहल इलाकों में भी ऑनर किलिंग के मामले सामने आते रहे हैं...हरियाणा औऱ राजस्थान में ऑनर किलिंग की एक भरी-पूरी परंपरा मौजूद है.......क्या ये किसी सभ्य समाज की तस्वीर हो सकती है..या फिर ये सब सुनने के बाद कौन कह सकता है कि हम आधुनिक युग में जी रहे हैं......सबसे शर्मनाक पहलू ये है कि इन वारदातों को अंजाम देने वाली संस्थाएं इतनी ताकतवर और बर्बर हैं कि प्रशासन और देश का कानून भी इनके सामने बेबस और लाचार हो जाता है...देश के हर नागरिक को ये अधिकार है कि वो अपनी पंसद की जिंदगी जी सके और संविधान और कानून में इसके लिए मुकम्मल इंतजाम भी किए गए हैं लेकिन अफसोस की बात ये है कि प्रशासन और कानून का पालन करवाने वाली संस्थाओं को राजनीतिक सिस्टम के नाम पर एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा कर रखा गया है कि वो अपना काम करने में लाचार हैं...अपराध, राजनीति..माफिया..भ्रष्टाचार, घूसखोरी, ये सब शब्द मानों प्रशासन और कानून का पर्याय बन चुके हैं। हमारी जिंदगी में ये ऐसा घुस चुके हैं जैसे खटिए में खटमल..और अब ऑनर किलिंग का प्रेत जो गांवों की दहलीज पर लगे पीपल के पेड़ से उतर कर बेताल की तरह हमारे दिमाग में जगह बनाने की जुगत भिड़ा रहा है.... कोई ताज्जुब नहीं कि एक दिन हम ऑनर किलिंग को सुनकर ऐसे ही रियक्ट करें मानो आमिर ने शाहरुख को कुत्ता कह दिया हो या करीना ने अपना प्रेमी बदल लिया हो..

आपका हमसफर
दीपक नरेश


राह बदल गई

कोई कहता है जमाना बदल गया है,
इश्क और दोस्ती का फसाना बदल गया है..
फितरत बदल गई है, उल्फत बदल गई है,
रिश्ते तो आज भी हैं, पर अफसाना बदल गया है..
गौर से देखिए तो कुछ अब भी है ऐसा,
जो न बदला था कभी, ना ही अब ही बदल गया है..
ये और बात है कि उनकी निगाह बदल गई है,
मंजिल तो वही है, पर अब राह बदल गई है...
उनकी राह में कभी हम भी थे, पर अब मुसाफिर बदल गए
हम आज भी हैं वही, पर मेरा यार बदल गया है...

आपका हमसफर
परमेंद्र मोहन