रविवार, 6 अप्रैल 2008
ये इंतजाम तो सॉलिड है रे बाबा..
शुक्रवार, 4 अप्रैल 2008
कसूर किसका ?
राहुल भाई की लेखनी से....
दोस्ती निभती नहीं
सच कहा दोस्ती निभती नहीं
निभे भी कैसे ?
तुम्हारे सतत् आघात मैं सह नहीं पाता
अपनी पीड़ा को हंसकर छुपा नहीं पाता
आत्मीयता के विस्तार में सीमा रेखाएं खीच नहीं पाता
दोस्ती के फासले जान नहीं पाता
अपनी परम अभिव्यक्ति रोक नहीं पाता
दोस्ती निभे भी कैसे ?
जब मेरी विनम्रता
तुम्हारे अहम् की पोषक बन जाए
तुम्हारी हँसी मेरे ह्र्दय पर कटाक्ष कर जाए
मेरा प्यार तुम्हारे गर्व का हास बन जाए
दोस्ती निभे भी कैसे ?
जब मैं झूठ तुमसे कह नहीं पाता
तुम्हारा पतन सह नहीं पाता
वह जाल जिसमें आदमी फंसते हैं
मैं बुन नहीं पाता...........
बुधवार, 19 मार्च 2008
ये जो है जिंदगी..
राहुल भाई का परिचय दोस्तों के लिए,....हमारे कॉलेज के जमाने के संगी, कविताओं से इनका नाता मियां बीवी वाला है.. ये अपनी कविताओं को दुलराते हैं..उससे लड़ते हैं झगड़ते हैं और कई बार ये जद्दोजहद इनकी कविताओं को एक खास तेवर दे जाती है..काफी जिंदादिल इंसान है... पेश हैं इनकी रुमानी जिंदगी से चुराए गए कुछ अल्फाज....
कुछ इस कदर उदास हो चली है जिंदगी
मिले कोई भी ख़ुशी वो गुदगुदी बनती नहीं
तुम गए क्या जिंदगी से नेह जैसे मिट गया
एक लम्बी दास्तां जो कभी मिटती नहीं